शौर्य: सत्य की खोज खण्ड - द्वितीय : शौर्य - एक ढोंगी व्यक्तित्व ! भाग - 1 : गांव का आश्रम !
खण्ड - द्वितीय : शौर्य - एक ढोंगी व्यक्तित्व !
भाग - 1 : गांव का आश्रम !
कहते है ज्ञानी और सन्यासी इस संसार से परे होते है । उनका इस भौतिक माया से कोई सम्बन्ध नही होता लेकिन हमे आज तक यह समझ नही आया कि लोग सन्यासी और ज्ञानी बन कैसे जाते है । किसी महापुरुष ने कहा है कि जिसके पास धन नही वो भिक्षुक बन गया जिंदगी से हार गए तो मंदिर मस्जिद में बैठ गए । उस खुदा के बन्दे बन गए । तक़दीर ने धोखा दिया तो नए रास्तो पर चल, मुसाफिर बन गए । सबके सब ढोंगी है । इस संसार को ढोंग नही कहेंगे तो क्या कहेंगे । हर कोई ढोंगी है यहाँ पर ।
हमारा यह शख्स जो शौर्य के नाम से विख्यात है , जिंदगी से हार कर, घर छोड़ कर भाग गया था । उसे उम्मीद थी कि वो एक तनाव मुक्त और व्यवस्थित जिंदगी जी सकेगा । किन्तु उसे ज्ञात नही था कि इस दुनिया का कोई भी ऐसा रास्ता नही है जो मुश्किलो और दुखो से घिरा हुआ नही है । करीबन एक साल तक दर भदर भटकता रहा । सबको बस एक ही बात बोलता कि सत्य की खोज में निकला है इस सफर पर् ।
हमारा यह नायक ढोंगी था । एक नंबर का ढोंगी । जीवन की जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाकर, बदनामी के डर से घर छोड़ कर भागा था । मगर यह दुनिया कभी भी तथ्यों को जानने का प्रयत्न नही करती बस भेड़ चाल से चलती है । और शुरू कर दिया शौर्य का अनुशरण करना । वो बन गया सबके लिए एक नए धर्म का संथापक और खुदा का सन्देश वक्ता । उसने एक छोटे से गाँव में अपना आश्रम बनाया और सभी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों उसके जीवन का एक हिस्सा बन गयी। शौर्य को पता था कि वह ढोंगी है किन्तु जो बात उसे दूसरे ढोंगियों से अलग करती थी, वो थी कि वह कभी स्वयं से झूठ नही बोलता था और न ही उसे किसी प्रकार का लोभ था ।
शौर्य का भाग्य था या गाँव वालो की किस्मत । उसके आने के बाद धीरे धीरे गाँव में खुशयाली बढ़ती चली गयी। और इसके साथ साथ लोगो की श्रद्धा भी शौर्य में अटूट होती चली गई । लोग शौर्य को भगवान का दर्जा देने लगे। उनकी आशाये और विश्वास शौर्य के प्रति बढ़ता चला गया । गाँव में जो भी कार्य होना होता , शौर्य की अनुमति लेकर ही किया जाता ।
अत्यधिक श्रद्धा और विश्वास भी एक कैद की तरह ही होती है । किन्तु शौर्य तो एक शांत जिंदगी जीने के लिए आया था । कब खुद को अशांत और विवश महसूस करने लगा , उसे पता ही नही चला । अब फिर से उसके मन में आज़ाद पंछी की तरह उड़ने की चाह पैदा हो चुकी थी । गाँव वाले उसे कदाचित भी गाँव छोड़ने देना नही चाहते थे ।
लेकिन वह निश्चय कर चूका था । उसकी मंजिल इस आश्रम तक सीमित नही थी । अब शौर्य पहले से ज्यादा व्यवस्थित और समझदार हो चूका था । उसने सोच लिया था कि वह दूसरी बार भागने की गलती नही करेगा । अब वह पहले खुद से लड़ेगा और खुद को जीतेगा । उसके बाद फैसला करेगा कि उसे क्या करना है । शौर्य ने खुद को सभी गाँव वालो से अलग कर लिया था। बहुत कम समय के लिए ही वो किसी से मिलता था । उसने अलग अलग धर्मो के लगभग हर ग्रन्थ का अध्ययन किया । ग्रन्थ भी तो किताबे ही होती है और किताबे कभी भी खुद को जीतने में सहायता नही कर सकती । हाँ , केवल मार्गदर्शन कर सकती है जिसकी शौर्य को अत्यंत आवश्यकता थी ।
शौर्य ने करीबन छह माह तक ग्रंथो का अध्ययन किया। ग्रंथो का अध्ययन करना और समझना दो अलग अलग बाते है । लगातार अध्ययन के उपरांत भी वह उनका आश्रय समझने में असफल रहा । इस सब घटना क्रम ने उसे यह स्थान छोड़ने पर विवश कर दिया । वह जान चूका था कि ग्रन्थ मनुष्य को कुछ नही सिखा सकते। अगर कोई कुछ सीखा सकता है तो वह है समय । समय ही सबसे बड़ा गुरु है और उससे बड़ा कोई भी गुरु नही हो सकता।
गाँव वालो से विदा ले, शौर्य फिर से निकल पड़ा । इस बार भी उसके पास केवल एक मशाल और एक किताब ही थी । उसका गांव ही उसके लिए परिवार बन गया था, उस दिन शौर्य फिर से अनाथ हो गया था, किन्तु आज़ाद भी हो गया था। इस बार वह अन्दर से भी उतना ही शांत और निश्चिन्त था , जितना बाहर से था । उसे राह मिल चुकी थी । अब उसने कहीं भी डेरा नही डाला । जो मिला उससे मिलता चला गया और जो खो गया उसे भुलाता चला गया । उसे सफर में बहुत से ज्ञानी और ध्यानी मिले । उसने बहुत कुछ सीखा उनसे । कई सिद्धिया, कई मन्त्र , कई शक्तियां और बहुत सारी शिक्षाएँ ग्रहण की उसने उनसे ।
एक दिन उसके मन में ख्याल आया कि क्यों न विश्व भ्रमण पर निकला जाये । जगह जगह घूमता , कीर्तन करता, प्रवचन करता , जोगियों की तरह घूमने लगा । कई स्थानों से लोग उसके साथ जुड़ने लगे , कुछ उसके शिष्य बन कर उसके साथ हो लिये, कुछ वापिस लौट जाते और कुछ नए जुड़ जाते । ऐसे ही कारवां बढ़ता चला गया ।
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