शौर्य: सत्य की खोज खण्ड - द्वितीय : शौर्य - एक ढोंगी व्यक्तित्व ! भाग -2 : शौर्य का पैतृक गाँव !



खण्ड - द्वितीय : शौर्य - एक ढोंगी व्यक्तित्व !


घूमते घूमते उनकी टोली शौर्य के पैतृक गाँव में आ पहुँचती है । सच मानो ! तो शौर्य भूल ही चूका था कि उसका कोई काला अतीत भी है, जिसमें केवल हार ही हार है । शौर्य को जब तक मालूम पड़ा कि यह उसका पैतृक गाँव हैं तब तक बड़ी देर हो चुकी थी ।

मनुष्य जितना बड़ा हो जाता है, उसे प्रसिद्धि मिल जाती है , जितना वह सम्मान पा लेता है । उसे उतना ही दर्द होता है पल भर में उसके मिटने का । शौर्य को पता चल गया था कि उसकी यह यात्रा यही खत्म होने वाली है । लेकिन यह पता नही था कि इसका अंत इतना भयानक होने वाला है ।

उसके गाँव वालो ने उसका इतना अपमान किया कि सालो तक मिला सम्मान इन कुछ क्षणों के आगे चुटकी भर रह गया । शौर्य ने सब कुछ हँसते हँसते सहन कर लिया । उसने वो सारे सत्य स्वीकार किये जिनकी वजह से वह घर छोड़ कर भागा था । उसने स्वीकार किया कि उन लड़को की मौत में उसका कोई हाथ नही था किन्तु अगर वह थोडा प्रयत्न करता तो उन लड़को को बचा सकता था ।

शौर्य के कबूलनामे ने शौर्य के शिष्यो के दिलो की धड़कनो को रोक दिया । शौर्य ने यहाँ आकर फिर से  सब कुछ खो दिया, अपने मन की शांति, अपने शिष्य, सब कुछ । आज फिर से जीवन के एक बड़े सत्य से वह वाकिफ हुआ था कि बदलाव सृष्टि का नियम है । यहाँ आकर दोबारा उसने सीखा, परिवर्तन ही अंतिम सत्य है ।
जिस सम्मान को अर्जित करने में सालो लग गए वो पल भर में ही लूट गया । दुनिया का सबसे धनी और खुशहाल आदमी कंगाल हो गया । सभी शिष्यो ने शौर्य को त्याग दिया और अनुनाययी थू थू करने लगे ।

वाह रे किस्मत ! किसी ने भी क्या खूब कहा है -
पल पल जोड़ कर मैंने एक जहाँ बनाया
हर बार लूट कर ले गया मुशाफिर
जब भी मैंने बगिया में फूल खिलाया ।

अब क्या कह सकते है । समय से परे तो न शौर्य है और न हम । जो भी दिखायेगा , देखना पड़ेगा । जो भी सुनाएगा , सुनना पड़ेगा । और जो भी सिखाएगा , सीखना पड़ेगा ।
उसके बाद शौर्य कहाँ गया, किसी को नही पता । शौर्य के साथ क्या हुआ, कोई नही जानता।

उसका बचपन क्या था , मुझे नही पता किन्तु जो उसने ढोंग से शुरू किया था आज यथार्थ बन चूका था । हो न हो वह एक परिपक्व साधू का रूप ले चूका था । उसने खुद को जीत लिया था । वह सबको समझाना चाहता था । परिस्थितियों के बारे में बताना चाहता था । लेकिन किसी ने न तो शौर्य को समझने की कोशिश की और न ही किसी ने उन हालातो को जानने का प्रयत्न किया । शौर्य ने चाहे किसी भी कारण घर छोड़ा हो और चाहे जो भी सम्भावनाये रही हो पर मुझे नही लगता क़ि शौर्य को मृत्यु ढंड देना उचित था ।

शौर्य पहले भी चला गया था और अब भी चला गया । उसके साथ ही उसके जीवन से जुड़े अनसुलझे पहलू भी ।
यहाँ से शुरू हुआ मेरा सफ़र - शौर्य के जीवन के बारे में जानने का । उसके बारे में खोजने का । उसके बचपन में क्या हुआ था और वो कौन सा युद्ध लड़ रहा था । हर सवाल का जवाब मुझे चाहिए । और हर परिस्थिति का मैं आंकलन करना चाहता था ।

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