Posts

Showing posts from December, 2019

खुद के पंख बना, खुले आसमान में उड़ जाना कितना मुश्किल है

एक युवक जब खुद को establish करने के लिए struggle कर रहा होता है तो अक्सर वो successful लोगो को देख कर कुछ depress सा हो जाता है।  उसकी उसी भावना को व्यक्त करती कुछ पंक्तियाँ: लेखक : अजय मोदीपुरिया अक्सर उड़ते लोगो को देख कर तन्हा हो जाता हूँ उनकी उड़ान से खुद को शिकवे में पाता हूँ। क्या सिर्फ रोशनी ही जीत की निशानी है तन्हाई में मै अक्सर, ये ही गीत दोहराता हूँ। कब तक इस दर्द को सहने की ताकत है मुझमे हर बार एक नयी ग़ज़ल लिख, दिल को बहलाता हूँ। मै यु तो चाँद बनने की ख्वाहिश नहीं रखता पर फिर भी क्यों चांदनी से जलन सी होती है मुझमे यु तो खुद को कुछ कहने की हिम्मत नहीं है पर फिर क्यों इस ख़ामोशी से घुटन सी होती है। अतिश्योक्ति की भी हद है ये मुझमे मै होकर भी , मुझमे फिर क्यों कुछ कमी सी महसूस होती है। बहने दूँ अब इस दर्द को मै नीर बनकर क्यों सहुँ अब इसको, मै पीर बनकर।  जिस्म से मेरे बहता, ये जो मेहनत का पानी है कैसे समझाऊ इसे , क्यों समझता नहीं ये धीर बनकर। एक संघर्षरत युवक, जिसका भविष्य एक अँधा सपना है उसके लिए गिरते हुए पत्थरो...