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बहुत सी ख्वाहिशें हैं जिन्हें मै पाना चाहता हूं

मैं जिंदगी को समझना चाहता हूं बहुत सी ख्वाहिशें है जिन्हें मैं पाना चाहता हूं दिन ढलते ही बदल जाती है जिंदगी मैं उगते सूरज को बदलना चाहता हूं क्या कसर रह गई मेरे तपने मे मैं आज हर जख्म का जवाब चाहता हूं सुना है खुदी को बुलंद करने से खुदा भी रजा पूछता है आज मैं उस बुलंदी की ऊंचाई जानना चाहता हूं मैंने इच्छाओं को मारकर यह जहां बनाया आज इस जहां को मारकर किस्मत आजमाना चाहता हूं बहुत सी ख्वाहिशें हैं जिन्हें मै पाना चाहता हूं बहुत आजमाया है तूने मुझको आज मैं भी वक्त को आजमाना चाहता हूं आसमान की गहराइयों में जाना चाहता हूं सब कुछ पाना चाहता हूं मारकर अपने हर डर को मैं अमर हो जाना चाहता हूं बहुत सी ख्वाहिशें हैं जिन्हें मै पाना चाहता हूं

एक शुरुआत करना बाकि है

 एक शुरुआत करना बाकि है  एक लम्बा सफर तय करना बाकि है  दर्द सहना बाकि है  अपने दर्द से , अपने डर से पार पाना बाकि है  जीतने से पहले बहुत बार हार जाना बाकि है  कुछ बनने से पहले कई बार टूट जाना बाकि है  अगर लगता है मजिल आसान है तो अपने मन को यह समझाना बाकि है  मुझे यकीन है खुद पर कि पहुंच तो जाऊंगा  पर अभी एक शुरुआत करना बाकि है  मै निकर आऊंगा सोने सा खरा  पर अभी जल कर राख होना बाकि है   तैरना सीखना मेरे शौंक में शामिल है  पर अभी कई बार डूबना बाकि है  यूँ तो मै भी उड़ना चाहता हूँ  पर अभी गिरकर कई बार उठना बाकि है  कुछ भी असम्भव नहीं है सुना है इस दुनिया में  अभी खुद की सीमाओं से पार पाना बाकि है  चमकना है मुझे अगर सूरज सा  तो खुद में आग जलाना बाकि है  एक कदम आगे बढ़ाना बाकि है  एक शुरुआत करना अभी बाकि है 

खुद के पंख बना, खुले आसमान में उड़ जाना कितना मुश्किल है

एक युवक जब खुद को establish करने के लिए struggle कर रहा होता है तो अक्सर वो successful लोगो को देख कर कुछ depress सा हो जाता है।  उसकी उसी भावना को व्यक्त करती कुछ पंक्तियाँ: लेखक : अजय मोदीपुरिया अक्सर उड़ते लोगो को देख कर तन्हा हो जाता हूँ उनकी उड़ान से खुद को शिकवे में पाता हूँ। क्या सिर्फ रोशनी ही जीत की निशानी है तन्हाई में मै अक्सर, ये ही गीत दोहराता हूँ। कब तक इस दर्द को सहने की ताकत है मुझमे हर बार एक नयी ग़ज़ल लिख, दिल को बहलाता हूँ। मै यु तो चाँद बनने की ख्वाहिश नहीं रखता पर फिर भी क्यों चांदनी से जलन सी होती है मुझमे यु तो खुद को कुछ कहने की हिम्मत नहीं है पर फिर क्यों इस ख़ामोशी से घुटन सी होती है। अतिश्योक्ति की भी हद है ये मुझमे मै होकर भी , मुझमे फिर क्यों कुछ कमी सी महसूस होती है। बहने दूँ अब इस दर्द को मै नीर बनकर क्यों सहुँ अब इसको, मै पीर बनकर।  जिस्म से मेरे बहता, ये जो मेहनत का पानी है कैसे समझाऊ इसे , क्यों समझता नहीं ये धीर बनकर। एक संघर्षरत युवक, जिसका भविष्य एक अँधा सपना है उसके लिए गिरते हुए पत्थरो...

मेरा क्या जाता है, मै तो उसी को खुदा जान लूंगा

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जब धर्म/महजब नही थे तब भी इंसान जिन्दा था जब कोई नही होगा तब भी जीवन होगा। कहत ये नास्तिक बंधू -न कोई आल्हा है न कोई राम न कोई जीसस है , झूठे है बाइबिल- वेद - कुरान यहाँ बसते है बस सैतान ही सैतान। अगर खून से खेलना ही है सबको तो उतार दो ये महजब का चोला। हिम्मत से लड़ो नास्तिक बनकर क्यों ओढ़ते हो ये धर्म /महजब का झोला। जो मुझमे है वो तुझमे भी है न तनिक है किसी को ज्यादा ज्ञान किसने तुझको बनाया, क्यों होता है सोच कर परेशान उतार कर देख ये नफरत की चादर मिट जायेगा ये तेरा सारा अज्ञान न तूने किसी को देखा न मैंने किसी को देखा न तुझसे पहले किसी ने देखा, न मेरे बाद कोई देखेगा फिर किसके लिए तू करता है ये सारे काम अगर दिखा सका तू मुझको, तो करूंगा तेरे धर्म को दंडवत प्रणाम न तेरा लिखा सही है , न मेरा लिखा सही है अगर तू लिखे हुए को सच कहता है , तो आज मेने भी खुद को खुदा लिख दिया तो क्या मै खुदा बन गया लिखा हुआ अगर सच होता तो आज न जाने कितने खुदा बन चुके होते ये तो सियासतों का जोर है पगले, जो खुदा का नाम बदलवाती है जिसका मन चाहे उसको खुदा लिखवाती ह...

कभी अजनबी थे, कल फिर अजनबी हो जायेंगे

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कभी अजनबी थे, कल फिर अजनबी हो जायेंगे जो है आज है, खुल कर जी लो, कल रास्ते खो जायेंगे याद आएंगे ये अपने, पर ये लम्हे लौट कर नहीं आएंगे कभी अजनबी थे, कल फिर अजनबी हो जायेंगे वो दोस्तों की आहट, किसी खास की मुस्कराहट हर किसी के प्यार में गिरना, गिर कर सम्भलना हँसना, खेलना, लड़ना और झगड़ना भूल न पाएंगे ये दिन, कल जब हम खुद को भी भूल जायेंगे कभी अजनबी थे, कल फिर अजनबी हो जायेंगे कह दो दिल की सारी बाते , कोई न राज रहे मिटा दो सब गिले - शिकवे , मिलने की कल शायद ही कोई आस रहे आंखे बोलती रही जो , अब लब्ज भी बोल जायेंगे आज खामोश रह गए तो , सब अपनी राहे मोड़ जायेंगे कभी अजनबी थे, कल फिर अजनबी हो जायेंगे सुनहरे पल जो हमने साथ गुजारे किसी का दिल तोड़ा, किसी की जिंदगी में किये उजारे कभी ख़ुशी से हँसे , तो कभी गम से रोए यहाँ आँखों में हमने जीवन के हर रंग संजोये जी करता है आँखे न खोले , वरना सपने टूट जायेंगे कभी अजनबी थे, कल फिर अजनबी हो जायेंगे कभी सोचेंगे अकेले में , तो खुद को तन्हा पाएंगे बस यादे ही होगी साथ, बाकि सारे निशान मिट जायेंगे ये हँसते हुए चहरे दुनिया की भीड़ में ...

शौर्य: सत्य की खोज - परिचय खंड - तृतीया : लेखक का सफर : शौर्य का सच !

यहाँ पढ़े:  शौर्य: सत्य की खोज - परिचय खंड - प्रथम : महा युद्ध पूर्व रात्रि भाग 1 : अंतर वार्ता ! यहाँ पढ़े।  भाग -2 : शौर्य - रूद्रा वार्तालाप खण्ड - द्वितीय : शौर्य - एक ढोंगी व्यक्तित्व ! भाग - 1 : गांव का आश्रम ! भाग -2 : शौर्य का पैतृक गाँव ! यहाँ पढ़े खंड - तृतीया : लेखक का सफर : शौर्य का सच ! मेरे सफर की शुरुआत शौर्य के गाँव से होती है । किसी भी महान व्यक्ति को उसकी जन्म भूमि जरूर याद रखती है । मैं भी अपने सफर की शुरुआत उसके गाँव से करना चाहता था। हर उस जगह मैं गया , हर उस शख्स से मैं मिला जहाँ मुझे उम्मीद थी कि शौर्य के बारे में कुछ जान सकता हूँ । पूर्व से पश्चिम , उत्तर से दक्षिण , हर उस देश, हर उस स्थान को मैंने खोज निकाला जहाँ शौर्य गया होगा । कहते है, शौर्य बहुत भाग्यशाली था, वह जहाँ भी गया, जहाँ से भी गुजरा, उस स्थान पर खुशयाली आती चली गयी । आज भी दुनिया के कुछ हिस्सों में शौर्य की मुर्तिया लोग घरों में रखना शुभ समझते है । इसी दौरान मुझे उसके गाँव के बारे में कुछ जानकारी मिली । किन्तु उस नाम के तो हजारो गाँव थे । कह...

शौर्य: सत्य की खोज खण्ड - द्वितीय : शौर्य - एक ढोंगी व्यक्तित्व ! भाग -2 : शौर्य का पैतृक गाँव !

यहाँ पढ़े:  शौर्य: सत्य की खोज - परिचय खंड - प्रथम : महा युद्ध पूर्व रात्रि भाग 1 : अंतर वार्ता ! यहाँ पढ़े।  भाग -2 : शौर्य - रूद्रा वार्तालाप खण्ड - द्वितीय : शौर्य - एक ढोंगी व्यक्तित्व ! भाग - 1 : गांव का आश्रम ! भाग -2 : शौर्य का पैतृक गाँव ! यहाँ पढ़े घूमते घूमते उनकी टोली शौर्य के पैतृक गाँव में आ पहुँचती है । सच मानो ! तो शौर्य भूल ही चूका था कि उसका कोई काला अतीत भी है, जिसमें केवल हार ही हार है । शौर्य को जब तक मालूम पड़ा कि यह उसका पैतृक गाँव हैं तब तक बड़ी देर हो चुकी थी । मनुष्य जितना बड़ा हो जाता है, उसे प्रसिद्धि मिल जाती है , जितना वह सम्मान पा लेता है । उसे उतना ही दर्द होता है पल भर में उसके मिटने का । शौर्य को पता चल गया था कि उसकी यह यात्रा यही खत्म होने वाली है । लेकिन यह पता नही था कि इसका अंत इतना भयानक होने वाला है । उसके गाँव वालो ने उसका इतना अपमान किया कि सालो तक मिला सम्मान इन कुछ क्षणों के आगे चुटकी भर रह गया । शौर्य ने सब कुछ हँसते हँसते सहन कर लिया । उसने वो सारे सत्य स्वीकार किये जिनकी वजह से व...