खुद के पंख बना, खुले आसमान में उड़ जाना कितना मुश्किल है
एक युवक जब खुद को establish करने के लिए struggle कर रहा होता है तो अक्सर वो successful लोगो को देख कर कुछ depress सा हो जाता है। उसकी उसी भावना को व्यक्त करती कुछ पंक्तियाँ:
लेखक : अजय मोदीपुरिया
अक्सर उड़ते लोगो को देख कर तन्हा हो जाता हूँ
उनकी उड़ान से खुद को शिकवे में पाता हूँ।
क्या सिर्फ रोशनी ही जीत की निशानी है
तन्हाई में मै अक्सर, ये ही गीत दोहराता हूँ।
कब तक इस दर्द को सहने की ताकत है मुझमे
हर बार एक नयी ग़ज़ल लिख, दिल को बहलाता हूँ।
मै यु तो चाँद बनने की ख्वाहिश नहीं रखता
पर फिर भी क्यों चांदनी से जलन सी होती है
मुझमे यु तो खुद को कुछ कहने की हिम्मत नहीं है
पर फिर क्यों इस ख़ामोशी से घुटन सी होती है।
अतिश्योक्ति की भी हद है ये
मुझमे मै होकर भी , मुझमे फिर क्यों कुछ कमी सी महसूस होती है।
बहने दूँ अब इस दर्द को मै नीर बनकर
क्यों सहुँ अब इसको, मै पीर बनकर।
जिस्म से मेरे बहता, ये जो मेहनत का पानी है
कैसे समझाऊ इसे , क्यों समझता नहीं ये धीर बनकर।
एक संघर्षरत युवक, जिसका भविष्य एक अँधा सपना है
उसके लिए गिरते हुए पत्थरो से उसूलो पर , चलना कितना मुश्किल है
खुद को बंद करके कमरे में, तपना कितना मुश्किल है।
साहस क्या, केवल युद्धों में देखे जाते है
कोई पूछे उस वीर के दिल से
उसके लिए धुंध के जंगलो से , अकेले निकलना कितना मुश्किल है।
हँसते हुए चहरे से ऊंचाई का अनुमान लगाना तो आसान है
पर वो क्या जाने, पांव में चुबे कांटे के निशान छिपाना कितना मुश्किल है
इस दर्द को सह पाना कितना मुश्किल है
जीत तो हम सब बाँट लेते है मिलजुल कर
पर हार में खुद को बचाना कितना मुश्किल है
यूँ तो रोज बन जाते है सहयात्री बहुत
पर इस अजनबी शहर में फिर से खुद को ढूंढ पाना कितना मुश्किल है।
भोर होते ही पंछियो की तरह उड़ जाना
अँधेरी रात में मुस्कराते हुए घर आना
तुम क्या समझोगे साहिब
बिन पानी के पेड़ उगाना कितना मुश्किल है।
सपने देखना तो पाप नहीं है दोस्त
पर खुद के पंख बना, खुले आसमान में उड़ जाना कितना मुश्किल है।
हिम्मत, साहस, धैर्य और समझधारी
ये ही तो जीत की कहानी है अरिन
पर इनके लिए बरसो तक
एक ही लकीर पर चल पाना कितना मुश्किल है।
खुद के पंख बना, खुले आसमान में उड़ जाना कितना मुश्किल है
बस आखिर में दो शब्द कहूंगा
नकाब पहन कर तो हम सब चलते है
पर खुद मै खुदा को ढूंढ पाना कितना मुश्किल है
हवाओ के संग तो सभी बहते है
धार के विपरीत उड़ पाना कितना मुश्किल है
इस अजनबी शहर में फिर से खुद को ढूंढ पाना कितना मुश्किल है।
लेखक : अजय मोदीपुरिया
अक्सर उड़ते लोगो को देख कर तन्हा हो जाता हूँ
उनकी उड़ान से खुद को शिकवे में पाता हूँ।
क्या सिर्फ रोशनी ही जीत की निशानी है
तन्हाई में मै अक्सर, ये ही गीत दोहराता हूँ।
कब तक इस दर्द को सहने की ताकत है मुझमे
हर बार एक नयी ग़ज़ल लिख, दिल को बहलाता हूँ।
मै यु तो चाँद बनने की ख्वाहिश नहीं रखता
पर फिर भी क्यों चांदनी से जलन सी होती है
मुझमे यु तो खुद को कुछ कहने की हिम्मत नहीं है
पर फिर क्यों इस ख़ामोशी से घुटन सी होती है।
अतिश्योक्ति की भी हद है ये
मुझमे मै होकर भी , मुझमे फिर क्यों कुछ कमी सी महसूस होती है।
बहने दूँ अब इस दर्द को मै नीर बनकर
क्यों सहुँ अब इसको, मै पीर बनकर।
जिस्म से मेरे बहता, ये जो मेहनत का पानी है
कैसे समझाऊ इसे , क्यों समझता नहीं ये धीर बनकर।
एक संघर्षरत युवक, जिसका भविष्य एक अँधा सपना है
उसके लिए गिरते हुए पत्थरो से उसूलो पर , चलना कितना मुश्किल है
खुद को बंद करके कमरे में, तपना कितना मुश्किल है।
साहस क्या, केवल युद्धों में देखे जाते है
कोई पूछे उस वीर के दिल से
उसके लिए धुंध के जंगलो से , अकेले निकलना कितना मुश्किल है।
हँसते हुए चहरे से ऊंचाई का अनुमान लगाना तो आसान है
पर वो क्या जाने, पांव में चुबे कांटे के निशान छिपाना कितना मुश्किल है
इस दर्द को सह पाना कितना मुश्किल है
जीत तो हम सब बाँट लेते है मिलजुल कर
पर हार में खुद को बचाना कितना मुश्किल है
यूँ तो रोज बन जाते है सहयात्री बहुत
पर इस अजनबी शहर में फिर से खुद को ढूंढ पाना कितना मुश्किल है।
भोर होते ही पंछियो की तरह उड़ जाना
अँधेरी रात में मुस्कराते हुए घर आना
तुम क्या समझोगे साहिब
बिन पानी के पेड़ उगाना कितना मुश्किल है।
सपने देखना तो पाप नहीं है दोस्त
पर खुद के पंख बना, खुले आसमान में उड़ जाना कितना मुश्किल है।
हिम्मत, साहस, धैर्य और समझधारी
ये ही तो जीत की कहानी है अरिन
पर इनके लिए बरसो तक
एक ही लकीर पर चल पाना कितना मुश्किल है।
खुद के पंख बना, खुले आसमान में उड़ जाना कितना मुश्किल है
बस आखिर में दो शब्द कहूंगा
नकाब पहन कर तो हम सब चलते है
पर खुद मै खुदा को ढूंढ पाना कितना मुश्किल है
हवाओ के संग तो सभी बहते है
धार के विपरीत उड़ पाना कितना मुश्किल है
इस अजनबी शहर में फिर से खुद को ढूंढ पाना कितना मुश्किल है।
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