शौर्य: सत्य की खोज खंड - प्रथम : महा युद्ध पूर्व रात्रि ! भाग 1 : अंतर वार्ता !
यहाँ पढ़े: शौर्य: सत्य की खोज - परिचय
खंड - प्रथम : महा युद्ध पूर्व रात्रि !
भाग 1 : अंतर वार्ता !
"आदमी अपनी सारी जिंदगी जी जाता है है और उसको आखिर तक पता नही चलता कि वह इस दुनिया में किस लिए आया था। यहाँ आकर उसे करना क्या था और किया क्या। यह सदियों से अनसुलझी पहेली है जिसका जवाब बहुत लोगो ने ढूंढने की कोशिश की। कुछ लोगो के इसी प्रयास में नए धर्मो की स्थापना हो गयी। सभी अपने धर्मो से जोड़ कर इसका उत्तर ढूंढने का दावा करते है किन्तु फिर भी यह पहेली ही बनी हुई है।
छोड़ो ! हमे इस तरह की दार्शनिक बातो से क्या। कल मै अपनी जिंदगी की आखिरी लड़ाई लड़ने जा रहा हूँ। मै नही जानता कि कल युद्ध के बाद क्या होने जा रहा है। चाहे जो भी हो मगर एक बात इस युद्ध में निश्चित है - वो है मेरी मृत्यु ! यही विधि का विधान है और यही आने वाले कल की पुकार।
इस रात मुझे नींद नही आएगी क्योकि दोबारा फिर मेरी जिंदगी में कभी रात आने वाली ही नही है। मुझे गम केवल इस बात का है कि कल का युद्ध मै जीत नही पाऊंगा, उस राक्षस को हरा नही सकूंगा। और ख़ुशी इस बात की है कि कल मै जीवन मरण से मुक्त हो जाऊंगा। इस सुख दुःख के चक्कर से आजाद हो पाऊंगा।
कल चाहे जो भी हो , आज की रात मेरी है। ये अँधेरा, ये ख़ामोशी, ये तन्हाई। यह असीम शांति एक अजीब सा डर पैदा कर रही है। बिलकुल वैसा ही डर जो इस सफर के शुरुआत में था जब मै घर बार छोड़ कर निकल पड़ा था एक अनजाने सफर पर सत्य की खोज में जिसे आज तक मै पा नही सका। एक दर्द भरे बचपन को पीछे छोड़ कर , एक घुटन भरे माहौल से ताजी हवा में , एक सुनहरे भविष्य की तलाश में।
आज भी वो दिन याद है जब एक नौजवान, सन्याशी के कपडे पहने एक हाथ में किताब लिए और एक हाथ में मसाल लिए हुए अपने गांव के अंतिम छोर पर खड़ा था। वहां उसे बस एक लम्बा और अंत हीन रास्ता ही दिखाई दे रहा है। उसके मन में सैंकड़ो डर, आशाये थी , अन्तर्द्धन्द्ध था मगर उसका निश्चय अडिग था। उसने इरादा कर लिया था कि अगर इस फैसले की सुबह वो हार गया तो भविष्य कभी भी नही बदल पायेगा। अगर पीछे मुड़ गया तो कभी आगे नही बढ़ पायेगा।
तब न मेरे पास खाने को कुछ था और न ही पास में किसी प्रकार का धन था। केवल मेरी भावना पवित्र थी। मै रुकता भी तो किसके लिए। वापिस भी तभी लौटता अगर कोई पुकारता। हजारो सवाल मन में लिए बढ़ रहा था उन पथरीले , कटीले रास्तो पर। बाहर से पूरी तरह शांत और निश्चिंत दिखायी पड़ने वाला युवक अंदर से उतना ही अशांत और अनिश्चित था।
समय ने आज फिर से मुझे उसी दोराहे पर खड़ा कर दिया है। मै लड़ रहा हूँ किसके लिए , मै मर रहा हूँ क्यों। चारो तरफ सब सोये पड़े है क्योकि मै जाग रहा हूँ। उन सबको विश्वास है कि मै सब की रक्षा कर लूंगा मगर मेरी रक्षा कोई नही कर सकेगा। मेरी रक्षा स्वयं भगवान ही कर सकते है क्योकि विधि के विधान को तो वह स्वयं भी नही बदल सकते।
अपने जीने के लिए भगवान से भी क्या विनती करू। वास्तव में तो मै स्वयं भी जीना नही चाहता। इस संसार का हर रूप मैंने देखा है। हर तरह का शख्स मुझसे मिला है। अब तो कल बस युद्ध मै लड़ना चाहता हूँ। आज तक सब कुछ मैंने अपने स्वार्थो के लिए किया है। अब मै कुछ इस दुनिया के लिए करना चाहता हूँ।
ऐसा लगता है जैसे कल की ही तो बात है जब उगते सूरज के साथ मेरे भी कदम बढ़ते गए। दिन बढ़ता गया , शाम हो गयी। अब तक तो मै खुद को खुशनसीब समझ रहा था कि उस नरक से छुटकारा पा कर आजाद हो गया हूँ। पर जैसे जैसे रात बढ़ती जा रही थी भूख और प्यास भी बढ़ती जा रही थी। तक मुझे लगा कि चाहे जो भी था पर उस नरक में खाना तो मिल ही जाता था। वो पहला क्षण था जब किसी चीज़ के न होने की हैमियत समझ में आई थी।
मेरा निश्चय अटल था इसलिए लौट कर नही जा सकता था। रात के अँधेरे में जंगली जानवरो का डर और कोई सुरक्षित जगह भी दिखायी नही पड़ रही थी। मगर मेरे कदम तो रुक ही नही रहे थे उन्हें तो आगे ही बढ़ते जाना था। न जाने क्या सोच कर बढ़ रहे थे ।
कई दिन ऐसे ही घूमता रहा। कभी खाने को कुछ मिल जाता तो कभी गन्दा पानी पी कर ही काम चलाना पड़ता। एक नरक से निकल कर दूसरे नरक में आ गया था यानि आसमान से गिरे और खजूर पर अटके। इस सफर में केवल एक ही साथी मेरे साथ था और वो थी मेरी किताब। यह वो ही किताब है जिसे हम अब अध्यात्म ज्ञान के नाम से जानते है। जब भी मै टूटने लगता इसका हर शब्द मुझे लड़ने की प्ररेणा देता , आगे बढ़ने की प्ररेणा देता।
उन दिनों ही मैने जाना की दिन कितने लम्बे होते है और राते कितनी भयानक। धीरे धीरे इन सब चीज़ो की मुझे आदत होने लगी और नए माहौल में ढलने लगा। पूरा एक वर्ष निकल गया मुझे भटकते भटकते किन्तु मेरी समझ मै ही नही आया कि मुझे करना क्या था।
जिंदगी से परेशान होकर कही बार मैंने वो कदम उठाने की कोशिश की जो मेरी जिंदगी को बर्बाद कर सकता था किन्तु न जाने किस शक्ति ने मुझे बचाये रखा। ये वो समय था जब मेरा हर फैसला मेरे खिलाफ जा रहा था और मै केवल सोचने के कुछ नही कर सकता था। कभी -कभी लगा आत्म हत्या कर लो लेकिन पता नही कौन सी आस मुझे जीने पर मजबूर कर रही थी। न जाने कौन सी अनजान शक्ति मेरी जिंदगी नियंत्रित कर रही थी। जो भी था मेरी समझ से परे था। और शायद इसी वजह से जिंदगी को अनसुलझी पहेली कहते है।
भाग -2 : शौर्य - रूद्रा वार्तालाप यहाँ पढ़े !
सोचते सोचते पता ही नही चला कब रूद्रा मेरे पास आ गया। रूद्रा मेरा एक मात्र जीवित बचा शिष्य है जो मेरे साथ इस युद्ध में आये मेरे शिष्यों में से एक है।
खंड - प्रथम : महा युद्ध पूर्व रात्रि !
भाग 1 : अंतर वार्ता !
"आदमी अपनी सारी जिंदगी जी जाता है है और उसको आखिर तक पता नही चलता कि वह इस दुनिया में किस लिए आया था। यहाँ आकर उसे करना क्या था और किया क्या। यह सदियों से अनसुलझी पहेली है जिसका जवाब बहुत लोगो ने ढूंढने की कोशिश की। कुछ लोगो के इसी प्रयास में नए धर्मो की स्थापना हो गयी। सभी अपने धर्मो से जोड़ कर इसका उत्तर ढूंढने का दावा करते है किन्तु फिर भी यह पहेली ही बनी हुई है।
छोड़ो ! हमे इस तरह की दार्शनिक बातो से क्या। कल मै अपनी जिंदगी की आखिरी लड़ाई लड़ने जा रहा हूँ। मै नही जानता कि कल युद्ध के बाद क्या होने जा रहा है। चाहे जो भी हो मगर एक बात इस युद्ध में निश्चित है - वो है मेरी मृत्यु ! यही विधि का विधान है और यही आने वाले कल की पुकार।
इस रात मुझे नींद नही आएगी क्योकि दोबारा फिर मेरी जिंदगी में कभी रात आने वाली ही नही है। मुझे गम केवल इस बात का है कि कल का युद्ध मै जीत नही पाऊंगा, उस राक्षस को हरा नही सकूंगा। और ख़ुशी इस बात की है कि कल मै जीवन मरण से मुक्त हो जाऊंगा। इस सुख दुःख के चक्कर से आजाद हो पाऊंगा।
कल चाहे जो भी हो , आज की रात मेरी है। ये अँधेरा, ये ख़ामोशी, ये तन्हाई। यह असीम शांति एक अजीब सा डर पैदा कर रही है। बिलकुल वैसा ही डर जो इस सफर के शुरुआत में था जब मै घर बार छोड़ कर निकल पड़ा था एक अनजाने सफर पर सत्य की खोज में जिसे आज तक मै पा नही सका। एक दर्द भरे बचपन को पीछे छोड़ कर , एक घुटन भरे माहौल से ताजी हवा में , एक सुनहरे भविष्य की तलाश में।
आज भी वो दिन याद है जब एक नौजवान, सन्याशी के कपडे पहने एक हाथ में किताब लिए और एक हाथ में मसाल लिए हुए अपने गांव के अंतिम छोर पर खड़ा था। वहां उसे बस एक लम्बा और अंत हीन रास्ता ही दिखाई दे रहा है। उसके मन में सैंकड़ो डर, आशाये थी , अन्तर्द्धन्द्ध था मगर उसका निश्चय अडिग था। उसने इरादा कर लिया था कि अगर इस फैसले की सुबह वो हार गया तो भविष्य कभी भी नही बदल पायेगा। अगर पीछे मुड़ गया तो कभी आगे नही बढ़ पायेगा।
तब न मेरे पास खाने को कुछ था और न ही पास में किसी प्रकार का धन था। केवल मेरी भावना पवित्र थी। मै रुकता भी तो किसके लिए। वापिस भी तभी लौटता अगर कोई पुकारता। हजारो सवाल मन में लिए बढ़ रहा था उन पथरीले , कटीले रास्तो पर। बाहर से पूरी तरह शांत और निश्चिंत दिखायी पड़ने वाला युवक अंदर से उतना ही अशांत और अनिश्चित था।
समय ने आज फिर से मुझे उसी दोराहे पर खड़ा कर दिया है। मै लड़ रहा हूँ किसके लिए , मै मर रहा हूँ क्यों। चारो तरफ सब सोये पड़े है क्योकि मै जाग रहा हूँ। उन सबको विश्वास है कि मै सब की रक्षा कर लूंगा मगर मेरी रक्षा कोई नही कर सकेगा। मेरी रक्षा स्वयं भगवान ही कर सकते है क्योकि विधि के विधान को तो वह स्वयं भी नही बदल सकते।
अपने जीने के लिए भगवान से भी क्या विनती करू। वास्तव में तो मै स्वयं भी जीना नही चाहता। इस संसार का हर रूप मैंने देखा है। हर तरह का शख्स मुझसे मिला है। अब तो कल बस युद्ध मै लड़ना चाहता हूँ। आज तक सब कुछ मैंने अपने स्वार्थो के लिए किया है। अब मै कुछ इस दुनिया के लिए करना चाहता हूँ।
ऐसा लगता है जैसे कल की ही तो बात है जब उगते सूरज के साथ मेरे भी कदम बढ़ते गए। दिन बढ़ता गया , शाम हो गयी। अब तक तो मै खुद को खुशनसीब समझ रहा था कि उस नरक से छुटकारा पा कर आजाद हो गया हूँ। पर जैसे जैसे रात बढ़ती जा रही थी भूख और प्यास भी बढ़ती जा रही थी। तक मुझे लगा कि चाहे जो भी था पर उस नरक में खाना तो मिल ही जाता था। वो पहला क्षण था जब किसी चीज़ के न होने की हैमियत समझ में आई थी।
मेरा निश्चय अटल था इसलिए लौट कर नही जा सकता था। रात के अँधेरे में जंगली जानवरो का डर और कोई सुरक्षित जगह भी दिखायी नही पड़ रही थी। मगर मेरे कदम तो रुक ही नही रहे थे उन्हें तो आगे ही बढ़ते जाना था। न जाने क्या सोच कर बढ़ रहे थे ।
कई दिन ऐसे ही घूमता रहा। कभी खाने को कुछ मिल जाता तो कभी गन्दा पानी पी कर ही काम चलाना पड़ता। एक नरक से निकल कर दूसरे नरक में आ गया था यानि आसमान से गिरे और खजूर पर अटके। इस सफर में केवल एक ही साथी मेरे साथ था और वो थी मेरी किताब। यह वो ही किताब है जिसे हम अब अध्यात्म ज्ञान के नाम से जानते है। जब भी मै टूटने लगता इसका हर शब्द मुझे लड़ने की प्ररेणा देता , आगे बढ़ने की प्ररेणा देता।
उन दिनों ही मैने जाना की दिन कितने लम्बे होते है और राते कितनी भयानक। धीरे धीरे इन सब चीज़ो की मुझे आदत होने लगी और नए माहौल में ढलने लगा। पूरा एक वर्ष निकल गया मुझे भटकते भटकते किन्तु मेरी समझ मै ही नही आया कि मुझे करना क्या था।
जिंदगी से परेशान होकर कही बार मैंने वो कदम उठाने की कोशिश की जो मेरी जिंदगी को बर्बाद कर सकता था किन्तु न जाने किस शक्ति ने मुझे बचाये रखा। ये वो समय था जब मेरा हर फैसला मेरे खिलाफ जा रहा था और मै केवल सोचने के कुछ नही कर सकता था। कभी -कभी लगा आत्म हत्या कर लो लेकिन पता नही कौन सी आस मुझे जीने पर मजबूर कर रही थी। न जाने कौन सी अनजान शक्ति मेरी जिंदगी नियंत्रित कर रही थी। जो भी था मेरी समझ से परे था। और शायद इसी वजह से जिंदगी को अनसुलझी पहेली कहते है।
भाग -2 : शौर्य - रूद्रा वार्तालाप यहाँ पढ़े !
सोचते सोचते पता ही नही चला कब रूद्रा मेरे पास आ गया। रूद्रा मेरा एक मात्र जीवित बचा शिष्य है जो मेरे साथ इस युद्ध में आये मेरे शिष्यों में से एक है।
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